WORDS OF PK ROY

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Pk Roy


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भारतीय सेना पर बेबुनियाद इल्जाम

Posted On: 20 Jun, 2017  
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जश्न ए हुकूमत और बदहाल किसान

Posted On: 13 Jun, 2016  
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आरक्षण नीति पर पुनर्विचार करना होगा

Posted On: 13 Oct, 2015  
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2013 गदर पार्टी के जन्मशती वर्ष के अवसर पर विशेष

Posted On: 19 Aug, 2013  
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1857 के स्वातंत्रय संग्राम की प्रबल प्रेरणा

Posted On: 23 May, 2013  
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अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद

Posted On: 27 Feb, 2013  
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गाँधी जीवन दर्शन और आज का देश

Posted On: 8 Feb, 2013  
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सोशल मीडिया का द्वंदात्मक पहलू

Posted On: 17 Dec, 2012  
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धधकता असम और नाकारा हुकूमत

Posted On: 3 Sep, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

चंद्रशेखर आज़ाद का नाम ब्रिटिश साम्राज्यवाद से उत्पीड़ित शोषित भारतवासियों के लिए क्रांतिकारी चेतना एक प्रतीक बन गया था। एक माउजर पिस्तौल उठाकर चंद्रशेखर आज़ाद ने ललकार दिया था, उस ब्रिटिश सम्राज्यवाद को जिसमें सूरज डूबता ही नहीं था। ब्रिटिश प्रशासन के बड़े बड़े अधिकारी आज़ाद के नाम से थर्रा उठते थे। चंद्रशेखर आज़ाद ने औपचारिक तौर पर बहुत कम शिक्षा ग्रहण की थी और मात्रा 14 वर्ष की उम्र में ही सब कुछ त्याग कर आज़ादी के संग्राम में शामिल हो गए थे। देश के प्रति अपने संपूर्ण समर्पण, अप्रतिम वीरता, क्रांतिकारी गतिशीलता, विलक्षण चातुर्य के बल पर वह अपने से कहीं अधिक शिक्षित दीक्षित क्रांतिकारियों के नेता और उनके पथ प्रदर्शक रहे। वह एक ऐसे क्रांतिकारी दल के निर्माता एवं सर्वोच्च कमांडर रहे, जिसने न केवल आज़ादी के संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई वरन् समाजवाद के महान् विचार को भारतीय राजनीति में सबसे पहले प्रेषित किया। देश से ब्रिटिश साम्राज्यवादी हुकूमत का खात्मा कर किसान मजदूरों के समादवादी राज्य के संस्थापन की सैद्धांतिक प्रस्थापना प्रस्तुत की थी। भारतीय समाज में व्याप्त साम्प्रदायिक धर्मान्धता के विरुद्व सशक्त आवाज़ बुलंद की। देश के वामपंथी आंदोलन के लिए एक बेहद ताकतवर पृष्ठभूमि का निमार्ण किया। सुन्दर जानकारी साझा करी है आपने महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर के विषय में ! सुन्दर पोस्ट

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

हिंद की तरक्की के नमूनों के तौर पर एक से बढ़ कर एक मॉडलों की कारें बाजारों में आई, बड़े बड़े मल्टीप्लैक्स और मॉल्स निर्मित हुए, किंतु अफसोस कि गरीब का झोपड़ा वही खड़ा दम तोड़ता रहा। यहां तक तरक्की के नाम पर करोड़ों आदिवासी किसानों के रिहाइशी झोपड़ें तक उजाड़ दिए गए और उनको दरबदर बनाकर नक्सल विद्रोहियों की नशृंस पाँतों मे दाखिल होने के लिए हूकूमतों द्वारा तशकील हालातों ने विवश कर दिया। अतिभोगवाद के पश्चिमी जीवन दर्शन के विरुद्ध प्रबल पांचजन्य फूंकने वाले गाँधी के सरलता और सादगी के विचार को नकारने की पहल गाँधी द्वारा नामित प्रधानमंत्री नेहरु द्वारा ही अंजाम दी गई, जबकि पं. नेहरु द्वारा गाँव-देहात और करोड़ों किसानों की आपराधिक उपेक्षा करके प्रथम पंचवर्षीय योजना की बुनियाद रखी गई। जिस गाँव-देहात और किसान के अपना प्रमुख आधार बनाकर और चरखा और दो बैलों की जोड़ी को काँग्रेस का प्रतीक चिन्ह बनाकर गाँधी की कयादत में आजादी का संपूर्ण संग्राम लड़ा गया। गाँधी जी उन्नीसवीं सदी में जितने प्रासंगिक थे उतने ही बल्कि उससे भी ज्यादा आज प्रासंगिक हैं और आज उनकी और उनकी शिक्षाओं की ज्यादा आवश्यकता है ! भले हिंदुस्तानी उन्हें गाली दें किन्तु विश्व आज भी उन्हें महत्त्व देता है !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: prabhatkumarroy prabhatkumarroy

बहुत जानकारी भरा लेख ! डा.अम्बेडकर की शानदार वैचारिक विरासत की तभी हिफाज़त हो सकती है, जबकि अम्बेडकरवादी भारतीय समाज के सबसे बदनुमा दाग़ जातिवाद को समूल नष्ट करने के संकल्प को कदाचित विस्मृत न करके भारतीय समाज को सामाजिक और आर्थिक तौर पर समतावादी बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो जाए। डा.अम्बेडकर ने कहा था कि दलितों तुम्हें अपनी दासता स्वयं ही समाप्त करनी है। दासता के खात्मे के लिए दलितों को किसी ईश्वरीय शक्ति अथवा किसी महामानव पर निर्भर नहीं रहना है। आगामी दौर में दलित आंदोलन को नई ऐतिहासिक उचाईयों को छूना है और बाबासाहेब डा.अम्बेडकर के सपनों के भारत का निर्माण करना है, बहुत सही और सटीक लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

मान्यवर प्रभात जी, नमस्कार. भारतीय न्याय प्रणाली और न्यायिक व्यवस्था पर आपने काफी गंभीर, विश्लेषणात्मक और तथ्यपरक जानकारी अपने आलेख में दी है. कमिटियाँ तो कई बनी, अच्छे-अच्छे सुझाव भी दिए गए, परन्तु उसपर कोई अमल नहीं किया गया. केवल दिखावा किया गया कि हम न्याय प्रणाली में सुधार के लिए चिंतित हैं. विगत कई दशकों में अनेक राजनीतिज्ञ चिंता करते-करते चिता की भेंट चढ़ गए. पर कोई कारगर सुधार नहीं किया गया. अनेक मुकदमों में दस वर्ष, बीस वर्ष लग जाते हैं. वादी-प्रतिवादी का अंत हो जाता है, मुकदमे का अंत नहीं होता. लेकिन एक बात से कम से कम मुझे तो इधर बहुत सुकून मिल रहा है, वह है जैसे को तैसा. जिस प्रकार किसी मुक़दमे में तारीख पर तारीख पड़ने पर आम जन का मन झुंझला जाता है, लेकिन वह विवश है, उसी तरह आज भ्रष्टाचार के आरोप में बंद राजनैतिक आरोपियों के साथ भी हो रहा है. भले ही आप इसे एक अव्यक्त प्रतिहिंसात्मक चैन कह लें, लेकिन आज इसी दौर से ये भी गुज़र रहे हैं. न्यूज़ में आता है, फलां की जमानत पर आज सुनवाई होगी, मन उत्सुक रहता है, शाम को न्यूज़ आता है, अब पंद्रह दिन बाद सुनवाई होगी, फिर पंद्रह दिन बाद न्यूज़ आता है, फैसला सुरक्षित रख लिया गया है, दस दिन बाद सुनाई जायेगी. अच्छा है, कुछ तो उन्हें इस व्यवस्था की तकलीफ का आभास हो. प्रभात जी, आशा और उम्मीद पर दुनिया कायम है और हम भारतीय तो कुछ ज्यादा ही आशावादी और धैर्यशील हैं. बदलाव होना चाहिए और होगा.

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959




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